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ई-कोर्ट मिशन से न्यायपालिका का डिजिटल कायाकल्प, 753 करोड़ से अधिक पृष्ठों का डिजिटलीकरण


विज्ञान 08 August 2026
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ई-कोर्ट मिशन से न्यायपालिका का डिजिटल कायाकल्प, 753 करोड़ से अधिक पृष्ठों का डिजिटलीकरण

ई-कोर्ट मिशन मोड परियोजना ने भारत की कागज-आधारित न्यायपालिका को डिजिटल-सक्षम, पारदर्शी और ट्रैक योग्य न्याय वितरण प्रणाली में बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वर्ष 2014 से अब तक मामलों की फाइलिंग और निपटान की संख्या करीब तीन गुना बढ़ी है और न्यायालय लगातार दाखिल मामलों की तुलना में अधिक मामलों का निपटारा कर रहे हैं। न्यायालयों के 753 करोड़ से अधिक पृष्ठों के अभिलेख डिजिटाइज किए जा चुके हैं, जबकि देशभर में स्थापित हजारों ई-सेवा केंद्र डिजिटल पहुंच की खाई को पाटने और नागरिकों को न्यायिक सेवाओं तक आसान पहुंच देने में मदद कर रहे हैं।

कागज से डिजिटल न्याय व्यवस्था की ओर बदलाव

एक अरब से अधिक आबादी को सेवाएं देने वाली भारतीय न्यायपालिका लंबे समय तक कागजी रिकॉर्ड और भौतिक ढांचे पर निर्भर रही। नागरिकों को अपने मामलों और दस्तावेजों के लिए अदालतों और अन्य कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ते थे, जिससे न्याय प्रक्रिया समय लेने वाली, जटिल और महंगी बन जाती थी। इन चुनौतियों से निपटने के लिए सरकार ने 2007 में ई-कोर्ट मिशन मोड परियोजना शुरू की। इसका उद्देश्य न्यायालयी कार्यवाहियों और अभिलेखों को डिजिटल बनाकर न्यायिक प्रक्रिया को तेज, सस्ता, सुलभ और पारदर्शी बनाना था।

तीन चरणों में आगे बढ़ा ई-कोर्ट मिशन

ई-कोर्ट परियोजना का पहला चरण 2011 से 2015 के बीच चला। इसमें 14,000 से अधिक अदालतों का कंप्यूटरीकरण और आवश्यक नेटवर्क बुनियादी ढांचे का विकास किया गया। दूसरे चरण में 2015 से 2023 तक नागरिक-केंद्रित सेवाओं का विस्तार हुआ। इसमें नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड (NJDG), ई-फाइलिंग और ई-सेवा केंद्र जैसी सुविधाएं शुरू की गईं। इस दौरान वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के बुनियादी ढांचे में भी पांच गुना से अधिक विस्तार किया गया।

तीसरे चरण में स्मार्ट और पेपरलेस अदालतों पर जोर

परियोजना वर्तमान में तीसरे चरण (2023-2027) में है। इस चरण का लक्ष्य बड़े पैमाने पर अभिलेखों का डिजिटलीकरण, वर्चुअल सुनवाई का विस्तार, न्यायिक संस्थानों के बीच बेहतर इंटरऑपरेबिलिटी तथा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), एनालिटिक्स और ऑप्टिकल कैरेक्टर रिकॉग्निशन (OCR) जैसी तकनीकों के इस्तेमाल के जरिए डिजिटल, पेपरलेस और अधिक स्मार्ट अदालतों का निर्माण करना है।

डिजिटल बुनियादी ढांचे का तेजी से विस्तार

ई-कोर्ट परियोजना के तीसरे चरण के तहत 1,806 ई-सेवा केंद्र न्यायालय परिसरों में स्थापित किए गए हैं। पेपरलेस अदालतों के लिए 474 अदालतों को आवश्यक उपकरणों से सुसज्जित किया गया है, जबकि वर्चुअल कोर्ट के विस्तार के लिए 538 अदालतों में डिजिटल बुनियादी ढांचा तैयार किया गया है। ई-फाइलिंग की सुविधा 4,519 अदालतों में लागू की गई है। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के लिए अदालतों, जेलों और अस्पतालों सहित 7,553 संस्थानों के बुनियादी ढांचे को अपग्रेड किया गया है। निर्बाध आईसीटी सुविधा के लिए 1,626 अदालत परिसरों में सौर ऊर्जा सुविधाएं स्थापित की गई हैं।

NSTEP से समन की डिलीवरी हुई ट्रैक योग्य

नेशनल सर्विस एंड ट्रैकिंग ऑफ इलेक्ट्रॉनिक प्रोसेसेस (NSTEP) की सुविधा 6,895 अदालतों में उपलब्ध है। इसके माध्यम से समन और नोटिस की इलेक्ट्रॉनिक तथा वास्तविक समय में डिलीवरी को ट्रैक किया जा सकता है। GPS आधारित यह व्यवस्था पारंपरिक कागजी प्रक्रिया की तुलना में अधिक पारदर्शी और तेज सेवा उपलब्ध कराने में मदद कर रही है। सभी उच्च न्यायालयों और जिला न्यायालयों की वेबसाइटों को S3WAAS प्लेटफॉर्म पर माइग्रेट किया गया है। अब तक 734 कोर्ट साइटें इस प्लेटफॉर्म पर माइग्रेट हो चुकी हैं। चरण-दो के तहत 18,380 अदालतों को अतिरिक्त हार्डवेयर भी उपलब्ध कराया गया।

ICJS से आपराधिक न्याय प्रणाली में बेहतर समन्वय

इंटरऑपरेबल क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम (ICJS) के जरिए अदालतों, पुलिस, जेलों और फोरेंसिक प्रयोगशालाओं जैसे अलग-अलग संस्थानों के बीच डेटा और सूचनाओं के आदान-प्रदान को आसान बनाया गया है। सभी उच्च न्यायालयों ने ICJS लागू किया है। हितधारकों के प्रशिक्षण के लिए 2,372 प्रशिक्षण सत्र आयोजित किए गए हैं। आईसीजेएस के तहत CCTNS, ITSSO, e-Sakshya, e-Summons, MedLEaPR, Nyaya Shruti, e-Forensic, e-Prison, e-Prosecution और NAFIS जैसी प्रणालियां आपराधिक न्याय प्रक्रिया के अलग-अलग हिस्सों को डिजिटल रूप से जोड़ रही हैं।

NJDG ने लंबित मामलों की स्थिति को बनाया पारदर्शी

चरण-दो के तहत शुरू किया गया नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड (NJDG) एक ऑनलाइन सार्वजनिक डैशबोर्ड है, जो न्यायालयों के आदेश, फैसलों और मामलों से जुड़ी जानकारी को ट्रैक करने में मदद करता है। इसमें सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालय और जिला न्यायालयों के लिए अलग-अलग डैशबोर्ड हैं। NJDG लंबित और निपटाए गए मामलों की संख्या, मामलों के प्रकार और कार्यवाही के विभिन्न चरणों की जानकारी उपलब्ध कराता है। इसके जरिए पक्षकारों की अनुपस्थिति, दस्तावेज लंबित रहने, कोर्ट स्टे और अन्य प्रक्रियात्मक कारणों से होने वाली देरी की स्थिति भी समझी जा सकती है। इससे न्यायिक योजना, निगरानी और प्रशासनिक कार्यों में भी सहायता मिल रही है।

ई-फाइलिंग से घर बैठे दस्तावेज दाखिल करने की सुविधा

ई-फाइलिंग व्यवस्था ने नागरिकों और वकीलों को शिकायत, हलफनामा, जवाब और अन्य आवेदन व्यक्तिगत रूप से अदालत में दाखिल करने की आवश्यकता को काफी हद तक कम किया है। अब दस्तावेज कहीं से भी ऑनलाइन दाखिल किए जा सकते हैं। प्रणाली अंग्रेजी के साथ क्षेत्रीय भाषाओं को भी सपोर्ट करती है और जिला न्यायालयों, उच्च न्यायालयों तथा सुप्रीम कोर्ट में काम करती है। ई-फाइलिंग प्लेटफॉर्म पर ऑनलाइन भुगतान, वकालतनामा जमा करने, ई-साइन से दस्तावेजों पर हस्ताक्षर, ऑनलाइन शपथ रिकॉर्डिंग, आवेदन दाखिल करने, पोर्टफोलियो प्रबंधन और मामलों की स्थिति ट्रैक करने जैसी सुविधाएं उपलब्ध हैं।

1.25 करोड़ से अधिक मामलों की ई-फाइलिंग

30 जून 2026 तक ई-फाइलिंग प्लेटफॉर्म पर 1.25 करोड़ से अधिक मामले दाखिल किए जा चुके हैं। ई-पेमेंट सिस्टम ने अदालत शुल्क के रूप में 1,404 करोड़ रुपए और जुर्माने के रूप में 75 करोड़ रुपए के लेन-देन को प्रोसेस किया है।

753 करोड़ से अधिक पृष्ठों का डिजिटलीकरण

ई-कोर्ट परियोजना के तीसरे चरण में करोड़ों पुराने न्यायालयी अभिलेखों का डिजिटलीकरण किया जा रहा है। अब तक 753 करोड़ से अधिक पृष्ठ डिजिटाइज किए जा चुके हैं। इससे पुराने मूल दस्तावेजों को भौतिक नुकसान से बचाने के साथ-साथ रिकॉर्ड की खोज और पुनर्प्राप्ति को तेज एवं आसान बनाने में मदद मिल रही है।

वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से दूरस्थ सुनवाई आसान

वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए वादी, वकील, गवाह और अन्य संबंधित पक्ष अदालत में शारीरिक रूप से उपस्थित हुए बिना सुनवाई में शामिल हो सकते हैं। इससे यात्रा का खर्च और समय बचा है तथा अलग-अलग शहरों और राज्यों में स्थित अदालतों तक पहुंच आसान हुई है। अदालतों, जेलों और अस्पतालों सहित 7,553 संस्थानों में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग सुविधाएं विस्तारित की जा चुकी हैं। अब तक 4.18 करोड़ से अधिक दूरस्थ सुनवाई की जा चुकी हैं। 11 उच्च न्यायालयों में कोर्ट कार्यवाही की लाइव स्ट्रीमिंग भी शुरू हो चुकी है।

वर्चुअल कोर्ट से 11.33 करोड़ ट्रैफिक चालानों का निपटारा

ट्रैफिक चालानों से जुड़े मामलों के ऑनलाइन निपटारे के लिए 31 वर्चुअल कोर्ट स्थापित की गई हैं। इन वर्चुअल कोर्टों ने 11.33 करोड़ चालान स्वीकार किए हैं, जिनकी कुल राशि 1,135.79 करोड़ रुपए है। 2024 में ICJS के तहत शुरू की गई न्याय श्रुति सुविधा अभियुक्तों, गवाहों, पुलिस अधिकारियों, अभियोजकों, वैज्ञानिक विशेषज्ञों और कैदियों को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए आभासी रूप से उपस्थित होने और गवाही देने की सुविधा देती है। इससे समय और संसाधनों की बचत के साथ मुकदमों के निपटारे में तेजी लाने में मदद मिल रही है।

डिजिटल प्लेटफॉर्म से केस ट्रैकिंग आसान

वकील, पक्षकार, न्यायाधीश और अन्य हितधारक बहुभाषी ई-कोर्ट सर्विसेज पोर्टल, ई-मेल, एसएमएस और मोबाइल ऐप के जरिए मामलों की स्थिति और अपडेट हासिल कर सकते हैं। प्रतिदिन चार लाख से अधिक SMS और छह लाख ई-मेल भेजे जाते हैं। बहुभाषी ई-कोर्ट सर्विसेज पोर्टल पर प्रतिदिन करीब 35 लाख हिट्स दर्ज होते हैं। ई-कोर्ट सर्विसेज मोबाइल ऐप के 3.84 करोड़ डाउनलोड हो चुके हैं। यह ऐप केस स्टेटस और कॉज लिस्ट जैसी जानकारी उपलब्ध कराता है। वहीं, JustIS ऐप न्यायाधीशों के लिए न्यायिक कार्यों के आयोजन और निगरानी में मदद करने वाला प्रबंधन उपकरण है।

ई-सेवा केंद्रों से नागरिकों को स्थानीय स्तर पर सहायता

न्यायालय परिसरों में स्थापित ई-सेवा केंद्र नागरिकों के लिए सहायता केंद्र के रूप में काम कर रहे हैं। यहां केस स्टेटस, अगली सुनवाई की तारीख, प्रमाणित प्रतियों के लिए ऑनलाइन आवेदन, ई-फाइलिंग, ई-स्टाम्प और ई-पेमेंट, डिजिटल हस्ताक्षर, ई-कोर्ट मोबाइल ऐप, ई-मुलाकात और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग सुनवाई जैसी सेवाओं में सहायता दी जाती है। 30 जून 2026 तक सभी उच्च न्यायालयों में 49 ई-सेवा केंद्र सक्रिय हैं, जबकि जिला न्यायालयों में 2,535 ई-सेवा केंद्र स्थापित किए जा चुके हैं। ये केंद्र नागरिकों को निःशुल्क कानूनी सहायता और वर्चुअल कोर्ट के जरिए ट्रैफिक चालान निपटाने जैसी सेवाओं के बारे में भी मार्गदर्शन देते हैं।

AI और मशीन लर्निंग से न्यायिक प्रक्रिया में नई संभावनाएं

ई-कोर्ट परियोजना के तीसरे चरण में उच्च न्यायालयों में AI और मशीन लर्निंग के इस्तेमाल को बढ़ाने की दिशा में काम हो रहा है। कुल 7,210 करोड़ रुपए के परियोजना आवंटन में से 53.57 करोड़ रुपए इस विकास के लिए निर्धारित किए गए हैं। इन तकनीकों का इस्तेमाल कानूनी शोध, केस मैनेजमेंट, ट्रांसक्रिप्शन, अनुवाद और न्यायिक निर्णय-सहायता में किया जा रहा है। AI और मशीन लर्निंग से जुड़े कई उपकरणों का पायलट परीक्षण चल रहा है। इनमें संवैधानिक पीठों की मौखिक दलीलों के ट्रांसक्रिप्शन, न्यायाधीशों के लिए कानूनी शोध और दस्तावेज विश्लेषण में मदद करने वाला LegRAA तथा पेपरलेस केस मैनेजमेंट के लिए Digital Courts 2.1 शामिल हैं।

18 भारतीय भाषाओं में फैसलों का अनुवाद

ASR-SHRUTI और PANINI जैसे उपकरण वॉइस-टू-टेक्स्ट और अनुवाद में सहायता कर रहे हैं। eSCR पोर्टल के जरिए 18 भारतीय भाषाओं में फैसलों का अनुवाद किया जा रहा है। राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (NIC) के साथ मिलकर अब तक 83,000 से अधिक अनुवाद किए जा चुके हैं, जिनमें मार्च 2025 तक 36,344 अनुवाद हिंदी में किए गए हैं। आईआईटी मद्रास द्वारा विकसित AI टूल ई-फाइल की गई याचिकाओं में कमियों को स्वचालित रूप से चिन्हित करने और केस डेटा तथा मेटाडेटा निकालने में मदद करता है। इसके प्रोटोटाइप को 200 एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड को उपलब्ध कराया गया है और इसे ई-फाइलिंग सिस्टम तथा कोर्ट केस मैनेजमेंट सॉफ्टवेयर में एकीकृत करने पर काम चल रहा है।

2027 तक और मजबूत होगी डिजिटल न्याय व्यवस्था

ई-कोर्ट मिशन ने पारंपरिक कागज-आधारित और प्रक्रियात्मक न्याय व्यवस्था को अधिक सुलभ, पारदर्शी और तकनीक-सक्षम प्रणाली में बदलने की दिशा में बड़ा बदलाव किया है। NJDG ने लंबित मामलों की जानकारी को सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराया है, जबकि बड़े पैमाने पर अभिलेखों का डिजिटलीकरण न्यायिक रिकॉर्ड की खोज और संरक्षण को आसान बना रहा है। तीसरे चरण के 2027 तक आगे बढ़ने के साथ AI, डिजिटल रिकॉर्ड, वर्चुअल सुनवाई, ई-फाइलिंग और संस्थानों के बीच डेटा इंटरऑपरेबिलिटी का विस्तार होने की उम्मीद है। इन पहलों से न्यायिक व्यवस्था को बढ़ते केस लोड से अधिक प्रभावी ढंग से निपटने और नागरिकों को उनकी स्थिति या स्थान की परवाह किए बिना अधिक तेज, पारदर्शी और सुलभ न्यायिक सेवाएं उपलब्ध कराने में मदद मिलेगी।

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