मदर टेरेसा का नाम दुनिया में मानव सेवा, करुणा और बेसहारा लोगों के बीच जीवन बिताने वाली शख्सियत के रूप में जाना जाता है। उन्होंने अपना जीवन गरीबों, बीमारों, अनाथों और समाज के सबसे कमजोर वर्गों की सेवा के लिए समर्पित किया। भारत में लंबे समय तक रहकर उन्होंने जरूरतमंद लोगों के लिए संस्थागत सेवा का एक बड़ा नेटवर्क खड़ा किया। उनकी सेवाओं को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली और 1979 में उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया। हालांकि, उनके काम और कुछ मान्यताओं को लेकर समय-समय पर सवाल और आलोचनाएं भी उठती रही हैं, लेकिन उनका नाम आज भी दुनिया भर में मानव सेवा के इतिहास में प्रमुखता से लिया जाता है।
स्कोप्जे में हुआ जन्म
मदर टेरेसा का जन्म 26 अगस्त 1910 को उस समय के ऑटोमन साम्राज्य के स्कोप्जे शहर में हुआ था, जो आज उत्तर मैसेडोनिया की राजधानी है। उनका मूल नाम एग्नेस गोंझा बोयाजियू था। उनके परिवार की पृष्ठभूमि अल्बानियाई थी। बचपन से ही धार्मिक और सामाजिक गतिविधियों से उनका जुड़ाव रहा। किशोरावस्था में उन्होंने मिशनरी जीवन और गरीबों की सेवा के प्रति गहरी रुचि विकसित की।
18 साल की उम्र में छोड़ा घर
लगभग 18 वर्ष की उम्र में एग्नेस ने अपना घर छोड़कर धार्मिक जीवन अपनाने का फैसला किया। वह आयरलैंड पहुंचीं और वहां लोरेटो सिस्टर्स से जुड़ीं। इसके बाद उन्होंने भारत आने का निर्णय लिया। 1929 में वह भारत पहुंचीं और दार्जिलिंग में धार्मिक प्रशिक्षण शुरू किया। बाद में उन्होंने कोलकाता के सेंट मैरी स्कूल में शिक्षिका के रूप में काम किया।
कोलकाता से शुरू हुआ सेवा का सफर
भारत में रहते हुए उन्होंने लंबे समय तक अध्यापन किया, लेकिन कोलकाता की गरीबी और वंचित लोगों की स्थिति ने उनके जीवन की दिशा बदल दी। 1946 में दार्जिलिंग की यात्रा के दौरान उन्हें गरीबों के बीच काम करने की प्रेरणा मिली, जिसे उन्होंने बाद में अपने जीवन का विशेष आह्वान बताया। इसके बाद उन्होंने स्कूल की अपेक्षाकृत सुरक्षित दुनिया से बाहर निकलकर झुग्गी-बस्तियों और जरूरतमंद लोगों के बीच काम करने का फैसला किया।
मिशनरीज ऑफ चैरिटी की स्थापना
1950 में मदर टेरेसा ने मिशनरीज ऑफ चैरिटी की स्थापना की। संस्था का उद्देश्य उन लोगों की सेवा करना था, जिनके पास समाज में सहारा या संसाधन नहीं थे। धीरे-धीरे इस संगठन का विस्तार भारत के अलग-अलग हिस्सों और फिर दूसरे देशों तक हुआ। संस्था ने अनाथ बच्चों, बेघर लोगों, गंभीर रूप से बीमार लोगों और जीवन के अंतिम पड़ाव पर पहुंचे लोगों के लिए सेवाएं शुरू कीं।
निर्मल हृदय से मिली पहचान
कोलकाता में उनकी सबसे चर्चित पहलों में से एक ‘निर्मल हृदय’ था। यह संस्था उन लोगों के लिए बनाई गई थी, जिन्हें जीवन के अंतिम समय में देखभाल और सहारे की जरूरत थी। मदर टेरेसा और उनकी सहयोगी ननों ने ऐसे लोगों की देखभाल की, जिन्हें परिवार या समाज ने अलग-थलग कर दिया था। इसी तरह अनाथ बच्चों के लिए भी संस्थाएं स्थापित की गईं।
सेवा का विस्तार भारत से दुनिया तक
मिशनरीज ऑफ चैरिटी का काम धीरे-धीरे भारत की सीमाओं से बाहर फैलता गया। संस्था ने एशिया, अफ्रीका, यूरोप और अमेरिका सहित कई क्षेत्रों में जरूरतमंद लोगों के लिए काम किया। मदर टेरेसा का जोर इस बात पर था कि समाज के सबसे कमजोर व्यक्ति को भी सम्मान और मानवीय देखभाल मिलनी चाहिए। इसी सोच ने उन्हें वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाई।
नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित
मदर टेरेसा को 1979 में नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया। नोबेल समिति ने उन्हें गरीब और पीड़ित लोगों के बीच उनके मानवीय कार्यों के लिए सम्मानित किया। पुरस्कार मिलने के बाद उनका अंतरराष्ट्रीय प्रभाव और बढ़ गया। उन्होंने अपने काम के लिए मिलने वाली प्रसिद्धि और संसाधनों का इस्तेमाल मिशनरीज ऑफ चैरिटी के विस्तार में किया।
भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान से सम्मानित
भारत सरकार ने 1980 में मदर टेरेसा को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया। इससे पहले भी उन्हें पद्मश्री सहित कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिल चुके थे। भारत में उन्हें विशेष रूप से कोलकाता और गरीबों के बीच किए गए उनके काम के लिए जाना गया।
आलोचनाओं से भी रहा नाता
मदर टेरेसा की लोकप्रियता के साथ उनके काम को लेकर आलोचनाएं भी सामने आईं। कुछ लेखकों और आलोचकों ने उनके संस्थानों में चिकित्सा सुविधाओं, गरीबी और पीड़ा को देखने के उनके तरीके तथा धार्मिक गतिविधियों को लेकर सवाल उठाए। कुछ आलोचनाओं में यह भी आरोप लगाया गया कि उनकी संस्थाओं को मिलने वाले धन के स्रोतों और उसके इस्तेमाल को लेकर पर्याप्त पारदर्शिता नहीं थी। मिशनरीज ऑफ चैरिटी ने कई मौकों पर अपने काम और उद्देश्य का बचाव किया तथा सेवा को अपने धार्मिक मूल्यों का हिस्सा बताया।
धर्म और सेवा को लेकर अलग दृष्टिकोण
मदर टेरेसा के लिए सेवा केवल सामाजिक कार्य नहीं, बल्कि धार्मिक आस्था से जुड़ी जिम्मेदारी थी। वह गरीबों और बीमारों की सेवा को ईसाई करुणा का महत्वपूर्ण हिस्सा मानती थीं। उनके समर्थकों के लिए यही दृष्टिकोण उनकी ताकत था, जबकि आलोचकों ने इसी धार्मिक पक्ष को लेकर अलग-अलग सवाल उठाए। इसके बावजूद उनकी संस्थाओं में काम करने वाले हजारों लोगों और स्वयंसेवकों ने दुनिया के कई हिस्सों में जरूरतमंदों की सेवा जारी रखी।
भारत में बनीं एक वैश्विक पहचान
मदर टेरेसा का जीवन भारत के साथ इस तरह जुड़ा कि उनकी अंतरराष्ट्रीय पहचान का बड़ा हिस्सा कोलकाता और यहां किए गए उनके काम से बना। उन्होंने अपना अधिकांश सक्रिय जीवन भारत में बिताया और भारतीय नागरिकता भी ग्रहण की। उनकी सादगी, सफेद-नीली किनारी वाली साड़ी और गरीबों के बीच उनकी मौजूदगी उनकी सार्वजनिक छवि का हिस्सा बन गई।
अंतिम वर्षों में भी जारी रहा काम
उम्र बढ़ने के साथ उनकी सेहत कमजोर होती गई, लेकिन उन्होंने मिशनरीज ऑफ चैरिटी के काम से खुद को पूरी तरह अलग नहीं किया। संगठन का विस्तार उनके जीवनकाल में लगातार होता रहा। 1990 के दशक में स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के कारण उन्होंने संस्था के नेतृत्व से हटने की इच्छा भी जताई, लेकिन बाद में उन्हें फिर नेतृत्व की जिम्मेदारी संभालनी पड़ी।
5 सितंबर 1997 को हुआ निधन
मदर टेरेसा का निधन 5 सितंबर 1997 को कोलकाता में हुआ। उनके निधन के बाद भारत सरकार ने राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया। उनके निधन पर भारत और दुनिया के कई देशों में श्रद्धांजलि दी गई। मिशनरीज ऑफ चैरिटी ने उनके बाद भी उनकी सेवा परंपरा को आगे बढ़ाया।
संत की मिली उपाधि
मदर टेरेसा को उनके निधन के बाद कैथोलिक चर्च में संत घोषित करने की प्रक्रिया शुरू हुई। 2003 में पोप जॉन पॉल द्वितीय ने उन्हें धन्य घोषित किया। इसके बाद 4 सितंबर 2016 को पोप फ्रांसिस ने वेटिकन सिटी में उन्हें संत टेरेसा ऑफ कोलकाता घोषित किया। इस समारोह में दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से बड़ी संख्या में लोग पहुंचे थे।
मानव सेवा की विरासत
मदर टेरेसा की विरासत आज भी दो अलग-अलग दृष्टिकोणों के साथ देखी जाती है। एक ओर उनके समर्थक उन्हें गरीबों और बेसहारा लोगों के लिए अपना जीवन समर्पित करने वाली महान मानवतावादी के रूप में देखते हैं। दूसरी ओर उनके आलोचक उनके काम के कुछ पहलुओं और उनके धार्मिक दृष्टिकोण पर सवाल उठाते हैं। इन मतभेदों के बावजूद यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि उन्होंने दुनिया का ध्यान उन लोगों की ओर खींचा, जिन्हें अक्सर समाज की मुख्यधारा में नजरअंदाज कर दिया जाता है।
सेवा से बनी वैश्विक पहचान
मदर टेरेसा का जीवन इस बात का उदाहरण बना कि किसी व्यक्ति का प्रभाव केवल राजनीतिक शक्ति या आर्थिक संसाधनों से नहीं, बल्कि समाज के कमजोर और वंचित लोगों के बीच किए गए काम से भी बन सकता है। कोलकाता की गलियों से शुरू हुई उनकी सेवा यात्रा अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंची और उन्होंने दुनिया के कई हिस्सों में धर्मार्थ संस्थाओं के लिए प्रेरणा पैदा की। आज भी मिशनरीज ऑफ चैरिटी से जुड़े कार्यकर्ता जरूरतमंद लोगों की सेवा में लगे हैं। मदर टेरेसा का नाम मानव सेवा के इतिहास में एक ऐसी शख्सियत के रूप में दर्ज है, जिनके जीवन और कार्यों ने करुणा, गरीबी और सेवा जैसे सवालों को वैश्विक विमर्श का हिस्सा बनाया।







