अगर हम कहें कि काफी हद तक ये मां के हाथ में होता है कि बच्चे को कैंसर या एडीएचडी जैसी बीमारियां होंगी या नहीं, तो क्या आप इसपर भरोसा करेंगे? मेडिकल साइंस भी इस थ्योरी की पुष्टि करता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, बच्चे की सेहत सिर्फ उसके जन्म के बाद मिलने वाले खानपान और परवरिश पर ही निर्भर नहीं करती, बल्कि उसकी नींव मां की गर्भावस्था के दौरान ही पड़ने लगती है। यही वजह है कि वैज्ञानिक गर्भ में पल रहे बच्चे के वातावरण और जन्म के बाद के शुरुआती महीनों को भविष्य की सेहत का सबसे अहम दौर मान रहे हैं।
प्रेग्नेंसी के दौरान वजन बढ़ना खतरनाक
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि अगर किसी महिला का गर्भावस्था के दौरान वजन ज्यादा बढ़ जाता है, तो इसका असर उसके बच्चे की सेहत पर कई दशकों बाद तक पड़ सकता है। ऐसे बच्चों में कम उम्र में बाउल कैंसर का खतरा बढ़ सकता है।
- बाउल कैंसर को आंत का कैंसर और कोलोरेक्टल कैंसर भी कहा जाता है। ये बड़ी आंत (कोलन या मलाशय) में शुरू होता है। मल त्यागने की आदतों में बदलाव, मल से खून आना, बिना किसी कारण वजन कम होना या पेट में लगातार दर्द रहना, इस कैंसर का सबसे आम संकेत माना जाता है।
लंदन के किंग्स कॉलेज में खानपान-जीवनशैली और स्वास्थ्य से जुड़े जोखिमों पर शोध करने वाली डॉ. रोजीरड ब्राउनसन-स्मिथ कहती हैं, अध्ययन में इस बात के संकेत मिले हैं कि मां का मोटापा और गर्भावस्था के दौरान जरूरत से ज्यादा वजन बढ़ना बच्चे में कम उम्र में कोलोरेक्टल कैंसर का खतरा बढ़ा सकती हैं।
यह बच्चे के जीवन की दिशा बदल सकता है। गर्भ में ही कुछ ऐसे जैविक बदलाव शुरू हो जाते हैं जो कई साल बाद बीमारी के रूप में सामने आते हैं।
गर्भावस्था में मोटापा, शिशु के लिए खतरा
अब तक माना जाता था कि गर्भावस्था के दौरान धूम्रपान-शराब जैसी आदतें शिशु के लिए खतरनाक हो सकती हैं। हालांकि अब सामने आया है कि गर्भावस्था में अधिक वजन या मोटापा जैसी स्थितियों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
शोध में पाया गया है कि जिन महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान मोटापा था, उनके बच्चों में कोलोरेक्टल कैंसर का खतरा सामान्य बच्चों की तुलना में दोगुने से भी ज्यादा हो सकता है।
इसके पीछे वैज्ञानिक दो संभावित वजह बताते हैं।
- पहली वजह यह है कि- मोटापे से ग्रस्त मां के बच्चों में आगे चलकर मोटापा होने की आशंका ज्यादा रहती है। मोटापा अपने आप में बड़ी आंत के कैंसर का एक बड़ा जोखिम कारक है, जिससे यह खतरा करीब पांच गुना तक बढ़ सकता है।
- दूसरी वजह यह है कि गर्भावस्था के दौरान ज्यादा वजन, बच्चे की विकसित हो रही पाचन नली (गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल ट्रैक्ट) पर सीधा असर डाल सकती है। इससे बच्चे की आंतें आगे चलकर अस्वस्थ जीवनशैली के प्रभाव के प्रति ज्यादा संवेदनशील हो जाती हैं।
क्या कहती हैं विशेषज्ञ?
डॉ. ब्राउनसन-स्मिथ बताती हैं कि कैंसर किसी एक घटना से नहीं होता। यह कई वर्षों तक शरीर की कोशिकाओं में धीरे-धीरे होने वाले आनुवंशिक बदलावों का परिणाम होता है। गर्भ में बच्चे में होने वाले शुरुआती जैविक प्रभाव शायद ऐसे बदलावों की शुरुआत करते हैं, जिनसे आंत की कोशिकाएं बाद में आसानी से खराब होने लगती हैं और समय के साथ कैंसर बनने की संभावना बढ़ जाती है।
- शोधकर्ताओं का मानना है कि जन्म के समय बच्चे का वजन भी इस खतरे से जुड़ा हो सकता है। ज्यादा वजन वाली महिलाओं से अक्सर अधिक वजन के साथ बच्चे पैदा होते हैं।
- जन्म के समय का वजन इस बात का संकेत हो सकता है कि गर्भ में बच्चे का वातावरण कैसा था। यही वातावरण शरीर के मेटाबॉलिज्म में लंबे समय तक रहने वाले बदलाव पैदा कर सकता है, जो आगे चलकर कैंसर के खतरे को प्रभावित करते हैं।
पहले हुए अध्ययनों में यह भी सामने आया है कि गर्भावस्था के दौरान ज्यादा वजन बढ़ने से शरीर में बनने वाले जरूरी ग्रोथ हार्मोन का संतुलन बिगड़ सकता है। इसका असर भी बच्चे की भविष्य की सेहत पर पड़ सकता है।
बच्चों में एडीएचडी का खतरा
एक अन्य अध्ययन में शोधकर्ताओं ने बताया कि गर्भावस्था के अलावा, बच्चे के जन्म के शरुआती महीनों में अगर मां कुछ बातों का ध्यान रख लेती है तो बच्चों को एडीएचडी के खतरे से बचाया जा सकता है।
एडीएचडी यानी अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर एक तरह की न्यूरो-डेवलपमेंटल स्थिति है, जिसके कारण बच्चों को ध्यान केंद्रित करने, स्थिरता से बैठने और आवेगों को नियंत्रित करने में दिक्कत होती है। कई लोगों में इसके लक्षण वयस्कता तक बने रह सकते हैं।
अध्ययन में पाया गया है कि जिन बच्चों को जन्म के बाद कम से कम छह महीने तक केवल मां का दूध पिलाया गया, उनमें एडीएचडी होने का खतरा बहुत कम था।
- ब्रिटेन में ज्यादातर महिलाएं बच्चे के जन्म के शुरुआती दो महीनों तक स्तनपान कराती हैं, लेकिन छह महीने तक पहुंचते-पहुंचते लगभग 40 प्रतिशत महिलाएं स्तनपान बंद कर देती हैं और फॉर्मूला दूध देना शुरू कर देती हैं।
- बायोलॉजिकल साइकेट्री जर्नल में प्रकाशित अध्ययन में नॉर्वे के शोधकर्ताओं का कहना है कि अभी यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं है कि स्तनपान यह सुरक्षा कैसे देता है। हालांकि मां के दूध में ऐसे पोषक तत्व मौजूद होते हैं जो बच्चे के दिमाग के विकास के लिए बेहद जरूरी हैं।
- यूनिवर्सिटी ऑफ बर्गेन के विशेषज्ञों ने इस अध्ययन में 37,643 बच्चों और उनकी माताओं के आंकड़ों का विश्लेषण किया।
- अध्ययन की प्रमुख लेखिका और मनोचिकित्सक डॉ. बेरिट स्क्रेटिंग सोलबर्ग ने बताया कि बच्चा जितने लंबे समय तक (अधिकतम छह महीने तक) सिर्फ मां का दूध पीता है, उसमें एडीएच के लक्षण उतने ही कम देखने को मिलते हैं।







