गोंड संस्कृति का मूल आधार प्रकृति, शांति और परम पवित्रता है। यह एक ऐसी जीवन पद्धति है जो जीव मात्र के प्रति दया और जल-जंगल-जमीन के प्रति अगाध आदर पर टिकी हुई है। लेकिन बालोद के तुएगोंडी-पाटेश्वर धाम विवाद में सबसे दुखद पहलू यह सामने आया है कि तथाकथित आंदोलनकारी और अलगाववादी नेता अपनी राजनीति चमकाने के लिए इस पावन संस्कृति के मूल सिद्धांतों के साथ ही खिलवाड़ कर रहे हैं।
जिस गोंड प्रथा
को हमारे पूर्वजों ने अत्यंत सात्विक और लोक-कल्याणकारी बनाया था, उसे आज सड़कों पर उग्र नारेबाजी,
मनमाने दावों और राजनीतिक सौदेबाजी का
जरिया बना दिया गया है। रूढ़ि-परंपरा की दुहाई देने वाले ये स्वयंभू नेता दरअसल
गोंड समाज की सबसे पवित्र और श्रद्धेय मान्यताओं को ही कलंकित और बदनाम करने का
काम कर रहे हैं।
वास्तविक गोंड प्रथा की पवित्रता बनाम
राजनीतिक घालमेल
प्राचीन काल से चली आ रही गोंड संस्कृति
के उन मूल तत्वों का विस्तृत विवरण नीचे दिया गया है, जिन्हें आज राजनीतिक रोटियां सेकने के
लिए विकृत किया जा रहा है:
1. सात्विकता और बलि
प्रथा का निषेध
गोंड समाज को जानबूझकर उग्र या हिंसक
दिखाने की कोशिशें हमेशा से बाहरी ताकतों द्वारा की जाती रही हैं, लेकिन जमीनी सच इसके ठीक उलट है।
·
परंपरा
का सच: वास्तविक
और पारंपरिक गोंड प्रथा में मनमाने ढंग से दी जाने वाली बलि प्रथा का हमेशा से कड़ा निषेध रहा है। पूर्वज मानते
आए हैं कि प्रकृति के देव कभी भी निर्दोष जीवों के रक्त से प्रसन्न नहीं होते।
·
जल
की पवित्रता: गोंड दर्शन में जल को जीवन का साक्षात आधार और साक्षात देवता
माना गया है। हमारी अटूट परंपरा रही है कि जल स्रोतों को पवित्र रखने के लिए उसमें कभी भी खून या
कोई भी अशुद्ध चीज नहीं डाली जाती। लेकिन आज कुछ उग्र तत्वों द्वारा व्यवस्था और समाज को चुनौती
देने के लिए परंपरा के नाम पर जिन हिंसक और मनमाने तौर-तरीकों का प्रदर्शन किया जा
रहा है, वह मूल गोंड दर्शन का
सरासर अपमान है।
2. देवस्थलों की एकांतता
और आध्यात्मिक ऊर्जा
आदिवासियों के पेन-ठाना (देवस्थल) या बूढ़ादेव
स्थल कभी भी कोलाहल या राजनीति के केंद्र नहीं रहे हैं।
·
शांत
वातावरण: हमारे
पूर्वजों की यह वैज्ञानिक और आध्यात्मिक समझ थी कि आदिवासियों के पारंपरिक देवस्थल
हमेशा गांव
से दूर, घने
जंगलों के बीच, एकांत
और शांत स्थानों पर होते हैं। ऐसा इसलिए किया जाता था ताकि
वहां की प्राकृतिक और आध्यात्मिक ऊर्जा (Spiritual Energy) अक्षुण्ण बनी रहे और मनुष्य वहां जाकर
मानसिक शांति पा सके।
·
राजनीतिक
अखाड़ा: दुर्भाग्य
से, आज इन अलगाववादी
नेताओं ने देवस्थलों को राजनीतिक अखाड़ा बना दिया है। जहां मौन और श्रद्धा होनी
चाहिए, वहां लाउडस्पीकर,
उग्र भाषण, राजनीतिक झंडे और विवाद खड़े किए जा रहे
हैं, जिससे इन स्थानों की
आध्यात्मिक पवित्रता नष्ट हो रही है।
3. 'देव आने' की पावन अवस्था का राजनैतिक दुरुपयोग
गोंड समाज में 'देव आना' (जब किसी बैगा, गायता या पुजारी के शरीर में देव शक्ति
का संचार होता है) एक अत्यंत गंभीर, पवित्र और पूजनीय घटना मानी जाती है।
·
निष्पाप
रूप: हमारी
परंपरा मानती है कि यह अवस्था अत्यंत पवित्र, निष्पाप और सात्विक रूप में होती है। जब
कोई व्यक्ति पूरी तरह शुद्ध मन से बैठता है, तभी सत्य परिणाम दायी होते हैं और लोक-कल्याण
के मार्ग खुलते हैं।
·
अविश्वास
का माहौल: आज कुछ स्वयंभू नेता और उनके समर्थक इस अत्यंत संवेदनशील और
श्रद्धेय परंपरा का राजनैतिक उपयोग कर रहे हैं। आंदोलनों और कलेक्ट्रेट के सामने
भीड़ के बीच इस पवित्र अवस्था का दिखावा या स्वांग रचा जाता है ताकि भीड़ को
उकसाया जा सके और प्रशासन पर दबाव बनाया जा सके। इस बचकानी और स्वार्थी हरकत से
समाज की इस अनूठी परंपरा पर पूरी दुनिया में उंगलियां उठ रही हैं और नई पीढ़ी का
इस व्यवस्था से विश्वास उठ रहा है।
बालोद के इस आंदोलन के पीछे गोंड
संस्कृति को बचाने की कोई नेक नीयत नहीं है। इसके विपरीत, यह अपनी ही प्राचीन, सौम्य और प्रकृति-पूजक परंपराओं को
राजनीतिक स्वार्थ की वेदी पर चढ़ाने का प्रयास है। आदिवासियों की वास्तविक परंपरा
हिंसक और उग्र नहीं, बल्कि
सात्विक और मर्यादित है, जिसे
इन अलगाववादी नेताओं के चंगुल से बचाना आज खुद आदिवासी समाज के सामने सबसे बड़ी
चुनौती है।







