विवेकानंद नगर स्थित ज्ञानवल्लभ उपाश्रय में जारी चातुर्मासिक प्रवचनमाला में बुधवार को मुनि संवेगरत्न सागर ने आचरण को ऊंचा बनाए रखने और अनाचार से बचने का संदेश दिया। मुनिश्री ने कहा कि जीवन में व्यक्ति जिस भूमिका में है, यदि वहां से नीचे गिरता है तो वह अनाचार कहलाता है। पूर्व भव में किया गया एक्शन इस भव में रिएक्शन के रूप में सामने आता है। प्रायश्चित ही इस रिएक्शन की परंपरा को समाप्त करने का मार्ग है।
मुनिश्री ने कहा कि यदि प्रायश्चित नहीं किया गया तो पूर्व भव के कर्मों का प्रभाव बना रहता है और दुख, दुर्गति व पीड़ा की परंपरा चलती रहती है। जीवन में जब उत्कर्ष का समय आए तो मन की स्थिति को स्थिर रखना चाहिए, क्योंकि उत्कर्ष स्थायी नहीं होता। उत्कर्ष के प्रति राग और आसक्ति बाद में दुख का कारण बन सकती है। किसी दूसरे के जीवन में उन्नति देखकर ईर्ष्या नहीं करनी चाहिए। ईर्ष्या व्यक्ति को अनाचार की ओर ले जाती है।
मुनिश्री ने कहा कि जीवन में आगे बढ़ना है तो साधना के क्षेत्र में आगे बढ़ें और इसके लिए सदैव गुरु भगवंतों का आसरा लें। केवल क्रिया से कर्म बंध नहीं होता, बल्कि उसके परिणाम और भाव कर्मबंधन का कारण बनते हैं। इसलिए अशुभ परिणामों से बचने के लिए अपने क्रियाकलापों और भावों पर विवेकपूर्वक नियंत्रण रखना जरूरी है।
मुनिश्री ने कहा कि अशुभ का अनुबंध जीव को अनंत संसार के भ्रमण में डाल देता है। भोग की इच्छा को टालने का प्रयास करें और भोग में लगी आतुरता को योग के स्वरूप में परिवर्तित करें। व्यक्ति के भाव ही उसके भव को बिगाड़ते हैं। भीतर आचार का ध्यान चल रहा है या अनाचार का, यही उसकी आगे की गति तय करता है।
मुनिश्री ने कहा कि जीवन में सदैव विवेक जागृत रहना चाहिए। अनाचार को छोड़ने का पराक्रम और आचार-अनाचार के बीच भेद करने का ज्ञान होना आवश्यक है। यही आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ने का मार्ग है। धर्मसभा में 28 उपवास के तपस्वी विजय संचेती का सम्मान चातुर्मासिक समिति ने किया। धर्मसभा के पश्चात मुनिश्री से मांगलिक प्राप्त कर गिरनार नेमी तप के करीब 150 तपस्वियों ने सामूहिक व्यासना किया। इस तरह से जिनवाणी के श्रवण के साथ तप के माध्यम से चातुर्मास में श्रावक-श्राविकाएं आत्मकल्याण के पथ पर अग्रसर हो रहे हैं।







